फर्रुखाबाद की बसन्त पँचमी पर विशेष --

 बचपन में "बसन्त पंचमी" को लेकर खास उत्साह रहता था, करीब एक महीने पहले से ही हम लोग बसन्त" की तैयारी में जुट  जाया करते थे। 

कितने खूबसूरत हुआ करते थे वे दिन,"बसन्त पंचमी" का पर्व फर्रुखाबाद वासियों के लिये विशेष होता है,वो इसलिये क्योंकि यहाँ "पतंगबाजी" के   शौक से गहरा सम्बन्ध है। 

'हालांकि यह स्पष्ट नहीं है कि  "पतंगबाजी" की शुरूआत यहाँ बसन्त पंचमी पर कैसे हुई? लेकिन  बचपन से लेकर अभी तक देखा है इस पर्व को उमंग और उत्साह के साथ "पतंग उत्सव" के रूप में ही मनाया जाता है।

 जैसे "होली" रंगों के लिये, "दिवाली" पटाखों के लिये,"रक्षा बंधन"  राखी के लिये, ठीक इसी तरह  "पतंग" के लिये "बसन्त" विशेष पर्व के रूप में  मनाया जाता है ।

उन स्वर्णिम दिनों की बात करूँ तो आज भी याद  हैं कि एक -एक "पतंग" के लिये कितना लड़ते- झगड़ते, कूदते -फांदते  गाली देते गालियाँ  खाते, कभी पिता जी की फ़टकार तो कभी  माँ का प्यार, पतंगबाजी" करने में इतना लीन की खाने - पीना से चिंतामुक्त , प्रातः काल तीन- चार बजे उठकर  घनी रात्रि में "तारों"की टिमटिमाहट 

के बीच छत पर चढ़कर 'दिवाला है, पोंका है,आई वो,वो  काटा, इत्यादि नारों से  सारे मोहल्ले को जगाना,अपने  सहपाठी मित्रों के साथ जमकर हुड़दंग करना! तेज ध्वनि में गीतों को बजाना बड़े- बड़े  स्पीकर लगाकर झूमना।,

इस पर्व से लगभग एक माह ,पंद्रह दिन पूर्व टाउनहॉल के नीचे घने जंगलों में जाकर बेर,बबूल,कनकुड़िया के वृक्षों से काँटो को चोरी छिपे काट कर घर लाना,और लगभग बीस से तीस फिट ऊँचे बाँस में काँटो को बाधकर पतंगों" को लूटना।

जनपद में यह पर्व मुख्यतः  तीन दिनों के लिये "छोटे बसन्त",बड़े बसन्त" यानी बसन्त पंचमी,और बूढ़े बसन्त के रूप  में मनाया जाता हैं। 

जनपद का  शायद ही कोई फर्रुखाबादी व्यक्ति होगा जो इस "पतंगबाजी" के शौक से अछूता रहा हो, गरीब हो या अमीर, छोटा हो या बड़ा हर कोई बसन्त पंचमी"को अपनी सामर्थ्य के अनुसार मानता है। उम्र के उस पड़ाव में हर किसी ने पतंगबाजी" का आनन्द अवश्य ही लिया होगा।।

बंसत पंचमी के दिन पूरे गगन में अलौकिक दृश्य देखने को मिलता है,जब सारा आसमान पतंगों की भिनभिनाहट से पटा पड़ा रहता है। शाम को  कोई कंडील  छोड़ कर आनंद लेता है तो कोई  पुराना टायर जलाकर ,दिन मूंदते  ही आसमान काली चादर से ढ़कने लगता है,पटाखों की गूंज  से दिवाली जैसी अनुभूति महसूस होती है, खैर आज व्यक्ति खुद में व्यस्त है, जीवन की डोर -ढील में लड़ रही  है हर व्यक्ति अपनी पतंग को अरमानों की इक्षा के आकाश में उड़ाने  में मग्न है अब किसी को इतनी फुर्सत कहाँ जो उस दौर जैसी पतंगबाजी का आनन्द ले ।


इसी के साथ आप सभी को बसन्त पंचमी पर्व की अनेकों शुभकामनाएं ।

दिलीप कश्यप "कलमकार" 9026692199

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