नाटक और रंगमंच भाग एक
नाटक और रंगमंच हिन्दी नाटक और नाटककार की दृष्टि, लेखन और नाटकीय समझ में बहुत महत्त्वपूर्ण और अनिवार्य मोड़ आया है। अक्सर सहयोग, सहअस्तित्व, सामंजस्य, 'नाटक और विचार', 'नाटककार और रंगमंच', नाटक कार और निर्देशक', 'नाटककार के अधिकार' के सवाल टिप्पणियों में, लेखों में उठते रहे हैं जिनसे हिन्दी नाटक जगत में सक्रिय आन्दोलन का परिचय तो मिलता ही है, एक लम्बे शुन्य और जड़ स्थिति के बाद सारे भ्रमों को तोड़कर नाटक की मौलिकता भी प्रतिष्ठित होती है। आज से कुछ वर्ष पहले मोहन राकेश ब० व० 'कारन्त और अनेक व्यक्तियों ने नाटक में सहयोग, सहअस्तित्व और सामं जस्य की बात कही थी और साहित्यिक विधा के रूप में उसके सही और पूर्ण रूप को समझने-समझाने का प्रयत्न किया था। इधर पन्द्रह वर्षों से नाटककार ने स्वयं नाटक को पहचाना ही नहीं है, बल्कि नाट्य समीक्षा के प्रतिमान बदलने की भरपूर कोशिश की है। प्रायः कहा जाता है और सही भी है कि हिन्दी नाटक अभी बहुत पिछड़ा हुआ है। यह सचमुच आश्चर्य की बात है कि सबसे पुरानी विधा होते हुए भी जीवन और विचार से, नवीनता और प्रयोग से, अनेक सम स्याओं से उसका ...