नाटक और रंगमंच भाग एक



नाटक  और रंगमंच


हिन्दी नाटक और नाटककार की दृष्टि, लेखन और नाटकीय समझ में बहुत महत्त्वपूर्ण और अनिवार्य मोड़ आया है। अक्सर सहयोग, सहअस्तित्व, सामंजस्य, 'नाटक और विचार', 'नाटककार और रंगमंच', नाटक कार और निर्देशक', 'नाटककार के अधिकार' के सवाल टिप्पणियों में, लेखों में उठते रहे हैं जिनसे हिन्दी नाटक जगत में सक्रिय आन्दोलन का परिचय तो मिलता ही है, एक लम्बे शुन्य और जड़ स्थिति के बाद सारे भ्रमों को तोड़कर नाटक की मौलिकता भी प्रतिष्ठित होती है। आज से कुछ वर्ष पहले मोहन राकेश ब० व० 'कारन्त और अनेक व्यक्तियों ने नाटक में सहयोग, सहअस्तित्व और सामं जस्य की बात कही थी और साहित्यिक विधा के रूप में उसके सही और पूर्ण रूप को समझने-समझाने का प्रयत्न किया था। इधर पन्द्रह वर्षों से नाटककार ने स्वयं नाटक को पहचाना ही नहीं है, बल्कि नाट्य समीक्षा के प्रतिमान बदलने की भरपूर कोशिश की है। प्रायः कहा जाता है और सही भी है कि हिन्दी नाटक अभी बहुत पिछड़ा हुआ है। यह सचमुच आश्चर्य की बात है कि सबसे पुरानी विधा होते हुए भी जीवन और विचार से, नवीनता और प्रयोग से, अनेक सम स्याओं से उसका संबंध उतना नहीं जुड़ पाया या उसमें इतने क्रान्तिकारी परि वर्तन नहीं हुए जितने कहानी में या कविता में। इसका मुख्य कारण है नाटक और शेष विधाओं के माध्यमों का प्रकृतिगत भेद । नाटक कोई 'पाठ्य पुस्तक' मात्र नहीं है जैसे कि कहानी और उपन्यास और उसकी तरह नाटक का सीधा सम्बन्ध पाठकों से होता है। बल्कि नाटक एक जीवन्त अनुभव है जो अपनी जीवन्तता रंगमंच पर ही प्राप्त है। नाटक की सही कसौटी रंगमंच ही है। रंगमंच को उसका निकष मानकर ही उसकी निजी सत्ता की खोज सम्भव है। नाट्यकृति और रंगमंच एक दूसरे के कार्य और कारण हैं, दूसरे स्तर पर एक दूसरे के पूरक और यहाँ तक कि एक दूसरे के पर्याय भी।' निस्सन्देह रंगमंच की आत्मा नाटकीयता है तो नाटक की आत्मा रंगमंचीयता है। बहुत पहले भरत मुनि ने अपने नाट्यशास्त्र में नाटक की इस मौलिकता और रंगमंच से उसके सम्बन्ध को स्थापित करते हुए ही कहा था कि नाटक का शरीर है याचिक अभि नय, क्योंकि आंगिक और सात्विक अभिनय तथा नेपथ्य आदि सब उसको ही (व्यंजित करते हैं। भरत मुनि ने जहाँ नाट्यशास्त्र द्वारा नाटक को नियमबद्ध किया या यहाँ इसकी सम्पूर्ण रचना-प्रक्रिया पर, सहयोगी कला रूप और रंगमंचीय कला रूप पर भी विचार किया था जिससे स्पष्ट होता है कि उस समय नाटक और उसके रंगमंच की परम्परा एक लम्बा फासला तय कर चुकी थी जिसे भरत मुनि ने शास्त्रीय रूप प्रदान किया। उन्होंने नाटक में मनोविनोद को, लोकरंजन को भी आवश्यक तत्व माना और उसके महत्व को, व्यापकता को, समस्त कलाओं में उसकी रम्यता को भी स्थापित किया। नाटक के प्रस्तुतीकरण, रंगमंच, उसके स्वरूप; उसके भेद, उसके विविध उपकरण, प्रेक्षागृह इत्यादि पर इतना विस्तृत विवेचन नाट्यशास्त्र में मिल जाता है कि भारतवर्ष में नाट्यकला के परि ष्कृत रूप के सम्बन्ध में कोई सन्देह नहीं रह जाता । नाटक के प्रस्तुतीकरण में भरत (नाट्यसंस्था का आधारभूत संचालक) सूत्रधार, नट, संगीत निर्देशक, वेशभूषा, साज-सज्जा के बनाने वाले, माला, मुकुट और आभरण बनाने वाले, पर्दा बनाने वाले, रंजक आदि के सामूहिक सहयोग और उद्योग पर नाटक की सफलता-असफलता की बात कहकर उन्होंने नाट्यविधा को स्पष्ट किया है जो आज भी अनिवार्य रूप से आधुनिक प्रतीत होता है। नाटक एक त्रिकोण से आबद्ध है— नाटककार, निर्देशक (सूत्रधार) और दर्शक लेकिन अभिनेता और अन्य सारा समूह भी उसका अनिवार्य अंग है इसलिए सारी नाटक प्रक्रिया इनके निरंतर तारतम्य, सहयोग, सामंजस्य से ही संभव है जो प्रत्यक्षतः रंगमंच पर दृष्टिगोचर होता है। यहीं यह सत्य भी सामने आ जाता है कि जिस देश का, जिस समय का रंगमंच जितना विकसित होगा, यहाँ तक कि जिस प्रकार के रंगमंच की व्यवस्था होगी, नाट्यरचना भी उसी प्रकार की रंगशालाओं के अनु रूप होगी । उदाहरण के लिए कालिदास और शेक्सपीयर के सामने अभिनय और निर्देशन की सशक्त परम्परा थी, रंगशद का एक सुव्यवस्थित, निश्चित रूप भी था और नाटककार भी रंग शिल्प, अपने युग की अभिनय शैली आदि से यानी अपने माध्यम से पूरी तरह परिचित थे। अपने समय की सारी संभाव नाओं का उपयोग उन्होंने अपने नाटकों में किया है। सभी संस्कृत नाटकों से तत्कालीन रंगशालाओं, रंग योजना, अभिनय शैली, मुद्रा-भंगिमाओं और शिल्प को अच्छी तरह पहचाना जा सकता है। इसलिए उस समय के नाटकों को पूरी  तरह समझने, अनुभव करने के लिए उनके समय के रंगमंच, रंगशालाओं आदि को जानना जरूरी होगा, यह अलग बात है कि आज भी हम कालिदास और शेक्सपियर के नाटकों में नयी रंग सम्भावनाएँ खोजकर भिन्न दृष्टि से उनके नये प्रयोग कर लें । इंग्लैण्ड में आज भी शेक्सपीयर के नाटक उतने ही लोकप्रिय हैं। क्योंकि आधुनिक रंगमंच पर उनके एक ही नाटक पर भिन्न-भिन्न प्रयोग करके वादविवाद उठाये जाते हैं, जो नाटक को विविध दृष्टियों से समझने में सहायता भी देते हैं; रंगमंचीय दृष्टि, रंग शिल्प और अभिनय की अनेक सम्भावनाओं को प्रकाशित भी करते हैं। यही नहीं दर्शकों में वैचारिक सक्रियता, उत्तेजना, उत्साह भी पैदा करते हैं और पुरानी से पुरानी कृति नयी से नयी लगती चली जाती है। हिन्दी नाटक के साथ यह स्थिति नहीं रही बल्कि नाटक और रंगमंच के बीच बड़ी गहरी खाई वर्षों तक बनी रही। चूँकि हिन्दी रंगमंच अविकसित रहा बल्कि वर्षों तक अस्तित्वहीन रहा, इसीलिए हिन्दी नाटक कई भारतीय भाषाओं बंगला, मराठी के नाटकों से पीछे रह गया । बंगाल और महाराष्ट्र में रंगमंच की लम्बी विकसित परम्परा मिल जाती है इसलिए उनके नाटकों में नाट्यशिल्प "और रंगशिल्प के नाट्यानुभव और रंगानुभव के स्तर उपलब्ध होते हैं। यहीं यह सत्य भी सामने आता है कि कभी-कभी नाटक भी रंगमंच को महत्त्वपूर्ण मोड़ दे देते हैं। उसके विकास सूत्रों को प्रकाश में लाकर एक सर्जनात्मक आन्दोलन की शुरुआत करते हैं क्योंकि उस नाटक में किसी न किसी रंगमंच की कल्पना, अभिनय-पद्धति, और अनेकानेक प्रयोगों की पूरी कल्पना निहित रहती है। यद्यपि उन तक पहुँचने, खोजने और उन्हें रंगमंच पर लाने में सारे 'रंगकर्मियों, अभि नेताओं, निर्देशकों का महत्त्वपूर्ण योग होता है । मोहन राकेश के नाटकों ने हिन्दी रंगमंच को सक्रियता ही नहीं दी, नाटक को सही माने में रंगमंच से जोड़ा, प्रचलित नाट्यरूढ़ियों को तोड़कर 'आधुनिक रंगमंच' की कल्पना को विकसित रंगमंच या प्रयोगशील रंगमंच' की कल्पना को साकार किया ।


यहाँ यह भी स्पष्ट करना होगा कि रंगमंच को नाटक का निकष कहने का यह तात्पर्य बिल्कुल नहीं है कि वही उसकी एकमात्र कसौटी है या वह निरा रंगमंच है। जो नाटक में केवल रंगमंचीयता का, अभिनेयता का आग्रह करेंगे, वे भी गुमराह कहे जायेंगे। अन्य साहित्यिक विधाओं की तरह नाटक भी भाषागत अभिव्यक्ति माध्यम है । शब्दबद्ध होने के कारण उसमें भी भाषा की अभिव्यंजना शक्ति को उतनी ही प्रधानता दी जायगी जितनी कहानी, उपन्यास में लेकिन शब्दबद्ध होने पर भी उसे कोरा साहित्य नहीं कहा जा सकता। नाटक न केवल साहित्य है और न केवल रंगमंचीय कला । यही उसकी जटिलता है। वह एक स्वतन्त्र साहित्य विधा के रूप में और विशिष्ट कला के रूप में पहचानी जानी चाहिए। बहुत मोटे तौर पर अगर हम उसे कविता, उपन्यास से अलग करना चाहें तो कह सकते हैं कि ये सभी पाठ्य होती हैं (हालांकि अब कविता, कहानी, उपन्यास विशेषकर कविता और कहानी नाटक या नाटकीयता के बहुत निकट आते जा रहे हैं) संवादात्मक होने के कारण नाटक में वाच्य तत्व मुख्य हो जाता है और यहाँ अभिनेता और दर्शक से उसका सम्बन्ध जुड़ जाता है। संवाद अभि नेता से ही दर्शक तक पहुँचते हैं और नाटक और नाटककार से साक्षात्कार कराते हैं। जहाँ कृति रचनाकार से निर्देशक, निर्देशक से अभिनेता और अभिनेता से दर्शकों तक और पूरी परिस्थितियों से, रंगकर्मियों से होती हुई प्रेक्षक तक पहुँचे वहीं नाटक की विशिष्टता, मौलिकता, जटिलता प्रत्यक्ष होने लगती है। बहुत से लोगों को कोई नाटक पढ़ने पर फीका लगता है और अभिनीत देखने पर प्रभावित करता है। कभी अच्छे से अच्छा नाटक भी मंच पर आकर मर जाता है – इसलिए नाटक एक सामूहिक संश्लेषणात्मक कला तो है ही, वह एक विशेष संतुलन की मांग भी करता है । आवश्यक है यह समझना कि रचनात्मक साहित्य का हर माध्यम अपना निजी अर्थ रखता है— यह निजी अर्थ जीवन प्रसंगों के भीतर से ही पैदा होता है। नाटककार परिवेश के संदर्भ में अगर जीवन की व्याख्या नहीं तो जीवन को प्रस्तुत करता है - पहले शब्दों से फिर उन शब्दों के अर्थ को दर्शकों तक संप्रेषित किया जाता है मंच द्वारा, जिसे नाटककार लक्ष्मी नारायण लाल ने 'अर्थ की रचना और फिर पूर्वरचना" कहकर जीवन संदर्भों के स्तर से महत्वपूर्ण, संश्लिष्ट स्वरूप धारण करने वाला नाटक कहा है। यानी नाटक में विचार या अनुभूति रहती है पर वही नाटक को सार्थक नहीं बनाते, उसके पीछे अगर दर्शक की संकल्पना और रंगमंच की अवधारणा है तभी वह विशिष्ट है । वस्तुत: कविता, कहानी का नितान्त वैधानिक होना फिर भी संभव है। लेकिन नाटक में वही घातक होगा- - व्यापक संदर्भों, बाह्य परिवेश और वाता वरण से जुड़कर नाटक एक समुदाय को प्रभावित या उत्तेजित कर सकता है। नाटक को हमारे यहाँ काव्य का ही एक प्रकार कहा गया है। कुछ लोगों के अनुसार काव्य में नाटक और नाटक में काव्य होना स्वतः सिद्ध है । प्रसाद का साहित्य इसका उदाहरण है यद्यपि 'कामायनी' महाकाव्य में नाटकीयता जिस प्रकार काव्य की आन्तरिक बुनावट में स्वतः समायी हुई है उस तरह से देखें तो उनके नाटकों में काव्य प्रायः आरोपित लगता है लेकिन फिर भी यह सत्य है कि जिस तरह कविता में बिम्बों, प्रतीकों और ध्वनि-संयोजन का महत्व है उसी तरह नाटक में भी है। विलियम नाइट ने बिम्बों को ही नाटक का कार्य-व्यापार माना है क्योंकि बिम्ब नाटक के निहितार्थ को सामने लाने में और पूरी रचना की बुना वट में सहायक होते हैं। प्रसाद ने नाटक में बिम्बों की शक्ति को पहचाना ही नहीं वरन् अपने विविध प्रयोगों द्वारा प्रतिपादित भी किया- उन्हीं के संदर्भ में भुव नेश्वर ने नाटक में बिम्बों, ध्वनियों, प्रतीकों के द्वारा भाषा की सूक्ष्म पकड़ का परिचय दिया और फिर यह सतर्कता और शक्ति मोहन राकेश में बड़े पैमाने पर दिखायी दी। आर्थर मिलर और इलियट जैसे नाटककारों ने नाटक की बुनावट में काव्य-तत्व को अनिवार्य ही नहीं माना बल्कि कविता को नाटक का स्वा भाविक और सीधा माध्यम कहा। जो नाटककार 'कवि' नहीं है वह मानो पूरा नाटककार नहीं है। इसी आधार पर गद्य-पद्य का अंतर केवल स्थूल अंतर है - एक से उपकरणों का उपयोग करने के कारण इन दोनों में कोई आवश्यक अंतर है ही नहीं। इस लिए नेमिचन्द्र जैन की यह बात बहुत संगत प्रतीत होती है कि श्रेष्ठ नाटक कविता के समान ही व्यंजना शक्ति का बिम्बमयता का, सघ नता और तीव्रता का, संगीत और लय का, शब्द और अभिव्यक्ति की अनिवार्यता का उपयोग करता है ।" यहीं यह भी मानना होगा कि दृश्यकाव्य अपने प्रच लित परम्परागत अर्थ में नहीं अर्थात् मंच भी दृश्य पदार्थ होने के कारण ही नहीं बल्कि सशब्द रंगानुभूति से सम्पन्न नाटककार अपनी भाषा शक्ति और नाटकीय शब्द प्रयोगों द्वारा भी मंच पर दृश्य प्रतीति करा सकता है। मोहन राकेश से भी पहले भुवनेश्वर ने नाट्य भाषा की इस शक्ति को पहचाना था और सिद्ध कर दिया था कि नाटक कुछ घटनाओं, पात्रों, दृश्यबन्ध, कार्य व्यापार की गतिशीलता, चरम सीमा से ही नहीं बनता बल्कि उसकी भाषा में ही सारी क्रियायें, सचेतनता, दृश्य प्रभाव सन्निहित हो सकते हैं जो बड़े गहरे अनुशासन से पैदा हो सकते हैं। मोहन राकेश ने स्वयं नाटकीय शब्द की खोज करते-करते नाट्य भाषा की शक्ति का अनुभव करते हुए ही 'रंगमंच को मूलतः श्रव्य माध्यम' कहकर सर्वथा नयी स्थापना पूरी तर्कदृष्टि के साथ की जिस पर अलग अध्याय में विस्तार से विचार किया गया है। हजारीप्रसाद द्विवेदी भी नाटक की विशेषता को स्पष्ट करते हैं— 'मेरी दृष्टि में नाटक रंगमंच पर अभिनीत होने के लिए ही होने चाहिए । केवल पढ़ने के लिए लिखा हुआ नाटक वस्तुतः विशिष्ट शैली का उप न्यास या गप्प है। नाटक विशुद्ध साहित्य नहीं है । विशुद्ध साहित्य शब्द और अर्थ पद और अर्थ के सहित- सहित (साथ-साथ) रहने वाली चीज है। वह श्रव्य है। नाटक में शब्द होते हैं पर और भी बहुत-सी बातें हैं। पुराने लोगों ने उसे ‘दृश्य-काव्य' कहा है । उसमें आँखों का और कानों का भी योग रहता है, चक्षु ग्राह्य होने के कारण वह दृश्य है और श्रुतिग्राह्य होने के कारण अव्य' इसलिए नाट्य समीक्षा अपने आप में एक अहम् सवाल है। समीक्षक को नाटक के इस 'विशिष्ट कला रूप', 'सामूहिक कलारूप' उसकी मौलिकता और निजी स्वरूप को ध्यान में रखना आवश्यक है। रंगमंच से सम्बद्ध होने के कारण सारे इति हास, परम्पराओं, रूढ़ियों, मान्यताओं, बाधाओं और विकास स्थितियों से परिचित हुए बिना नाट्य समीक्षक अपने दायित्य को नहीं निभा सकता ।


हिन्दी नाटक के साथ नाटक के विधागत अन्तर को न समझने की भारी विडम्बना रही, नाटककार और समीक्षक दोनों की ओर से । ऐतिहासिक दृष्टि से भारतेन्दु हरिश्चन्द्र वह पहले नाटककार हैं जिन्होंने नाटक की माध्यमगत, कालगत विशेषताओं को पूरी तरह समझा और इसी विधा को जन-सम्पर्क स्था करने की दृष्टि से भारतीय सभ्यता-संस्कृति के प्रभावक रूप में जन-जागृति, राष्ट्रीय और सामाजिक चेतना लाने की दृष्टि से सबसे सशक्त माध्यम समझा और व्यक्तिगत ही नहीं सामूहिक प्रयासों द्वारा हिन्दी रंगमंच और नाटक इति हास में एक नयी परंपरा को आरंभ करना चाहा। उनसे पहले हिन्दी क्षेत्र में लोक-नाटकों या लोक-रंगमंच की परम्परा मौजूद थी लेकिन उसकी भी सीमायें थीं। रामलीला, रासलीला नौटंकी, स्वाँग आदि तेजी से बदलते जाते मूल्यों और उस पूरे युग से सम्बन्धित नहीं थे, केवल मनोरंजन ही उनका लक्ष्य था । दूसरी ओर पारसी रंगमंच और नाट्य लेखन विशुद्ध व्यावसायिक दृष्टि से ही सही-बड़े दर्शक वर्ग को आकर्षित कर रहा था। उनके कुरुचिपूर्ण सस्ते लेखन और प्रस्तुती करण ने साहित्यकारों, बुद्धिजीवियों के मन में वितृष्णा पैदा की— 'थियेटर' और 'नाटक' शब्द यहीं से एक भद्दी कल्पना और अधकचरी मानसिकता के साथ जुड़ गया—एक बदनाम और उपेक्षणीय वस्तु बन गया । नाटक जैसी साहित्यिक विधा के साथ कम्पनी का हल्का नाम जुड़ता गया और अभिनय और अभि नेताओं के साथ अप्रिय भाव पैदा होता गया। नाटक परदों, नाच-गानों, शेरो शायरी, अश्लील दृश्य और हल्के-फुल्के मनोरंजन का केन्द्र बन गया; परिणामतः 'रंगमंच' ने स्वयं अपना सारा व्यापक अर्थ खो दिया। लोगों की मनोभूमि में रंगमंच एक व्यापक अनुभूति के रूप में लगभग मर गया। नतीजा यह हुआ कि हिन्दी नाटककारों के मन में आरंभ से ही रंगमंच की दूरी बनी रही। उनका उद्देश्य ही मानों पारसी नाटकों और रंगमंच के विरोध में नाट्य रचना करना था इसीलिए आरंभ का समूचा हिन्दी नाटक भारतेन्दु से प्रसाद तक पारसी रंगमंच और नाटकों की प्रतिक्रिया में जन्म लेता हुआ साफ प्रतीत होता हैं । इस प्रतिक्रियात्मक दृष्टि ने जहाँ नाटक को साहित्यिक दृष्टि से समृद्ध बनाया वहां रंगमंच से, उसको 'कलात्मक मौलिकता' से उसे एकदम काट दिया। एक बड़ी दयनीय और खतरनाक स्थिति यहीं से पैदा हो गयो-नाटककारों में भी समीक्षकों में भी । नाटक दो खानों में बँट गया- साहित्यिक नाटक और रंग मंचीय नाटक। यह हास्यास्पद वर्गीकरण वर्षों तक चलता रहा, चल रहा है। आज भी, पाठ्यक्रमीय आलोचनात्मक पुस्तकों में कक्षाओं में अध्ययन अध्यापन में और परीक्षा-पत्रों और परीक्षा-पुस्तिकाओं में, जो बड़ी घातक स्थिति है। नाटक और रंगमंच में संधिकालीन सोपानों का हिन्दी में क्रमशः विकास ही नहीं हुआ ।

भारतेन्दु काल को हिन्दी नाटक और रंगमंच की दृष्टि से सार्थक सक्रियता और प्रयत्न का काल कहा जा सकता है। स्वयं भारतेन्दु ने नाटक को परि चयात्मक स्तर पर ही नहीं, प्रयोगात्मक दृष्टि से भी देखा। उन्होंने ही पहली बार अपने निबन्ध 'नाटक' में प्राचीन नाट्यकला और अर्वाचीन नाट्यकला का परिचय दिया। दोनों के नाट्यतत्वों का समन्वय करके कोई मानदंड उन्होंने भले ही स्थापित नहीं किये क्योंकि उस समय बहुत से प्रश्न उनके सामने थे हिन्दी-नाट्य लेखन, अनुवाद, प्रदर्शन प्रस्तुतीकरण, रंगमंच, नाट्यभाषा, जन जागरण, राष्ट्रीय चेतना और लोकरुचि के परिष्कार का सवाल, पारसी थियेटर के विरुद्ध लड़ाई । इसीलिए भारतेन्दु के नाटक पारसी थियेटर के नाट्यतत्वों की सीमा में उतने बँधे हुए नहीं दीखते जितने कि प्रसाद के । भारतेन्दु निरन्तर थियेटराना जगत से अलग नयी नाट्य परम्परा, भिन्न नाट्यशिल्प और हिन्दी रंगमंच की स्वतंत्र विकास परम्परा के प्रति संघर्षशील रहे। परिणामतः भारतेन्दु कालीन सभी नाटकों की दो विशेषतायें मुख्य लगती हैं- एक तो जनजीवन से उनकी निकटता और देशोद्वार के पति उनकी चेतना, दूसरे उनकी रंगमंच के प्रति, नाटक के माध्यम के प्रति सजगता। इसीलिए इस युग में जहाँ एक ओर इतिहास और पुराण से कथा-वस्तु ली गयी वहाँ सीधे-सीधे तत्कालीन जीवन से भी कथा वस्तु का चयन किया गया । इसीलिए उनमें अंधविश्वासों, कुरीतियों और धर्म के नाम पर होने वाले पाखंड और अनेक विडम्बनाओं पर व्यंग्य और विद्रोह का भाव भी मिलता है जन-जोवन में गहरी पैठ, तिलमिला देने वाले


व्यंग्य ने और भारतेन्दु की सतर्क दृष्टि और संवेदनशीलता ने एक ऐसी नाट्य भाषा को जन्म दिया जो बोलचाल की सरल, मुहाविरों से सजी भाषा तो थी ही उनकी जिन्दादिली का प्रतीक भी थी, दर्शकों के मन से बल्कि 'लोकमानस' से सीधे टकराने वाली थी। आज हम हिन्दी नाटक में जिस सांकेतिकता का वैशिष्ट्य देखते हैं, वह इस काल के सभी नाटकों में अपने प्रायोगिक या आर म्भिक रूप में मिलती है। 'भारत दुर्दशा,' 'भारत जननी' जैसे नाटक सांक तिकता के ही उदाहरण हैं। सामाजिक यथार्थ को सामने लाने के लिए मूर्त तथा अमूर्त कथाओं को नाटकीय रूप देकर सांकेतिक शैली की आवश्यकता का अनु भव और आरंभ भारतेन्दु से हुआ । यहाँ तक कि नाटक के संगीत पक्ष पर भ उनका ध्यान गया। संगीत तत्व को आवश्यक मानते हुए जिस तरह उन्होंने लोक-संगीत, या लोकगीतों को नाटक में स्थान दिया वहीं इस बात का प्रमाण है कि वह नाटक को लोक-जीवन-जन मानस के निकट लाने का प्रयास कर रहे थे और देशव्यापी आन्दोलन या मानसिक परिवर्तन के लिए नाटक का उपयोग सशक्त अस्त्र के रूप में कर रहे थे। यह नहीं भूलना चाहिए कि नाट्यशास्त्र नाट्यरूढ़ियों का ग्रंथ होते हुए भी लोक-जीवन पर विशेष बल देता है। क्योंकि जीवन संबंधी अभिनय विधियों का निर्देश भी इसमें है। नाटक की सिद्धि उसके लोकसिद्ध होने में ही मानी है क्योंकि किसी भी नाटक की सफलता-असफलता का प्रमाण लोक ही है। भारतेंदु ने भी लोक प्रवृत्ति, लोक-जीवन को नाटक का आधार माना और सामूहिक स्तर पर नाटकीय आंदोलन, रंगान्दोलन की आव श्यकता को महसूस किया। उनका युग उनके नेतृत्व में सामूहिक संघर्ष और प्रयत्न का युग है । उनका पूरा मंडल एक ही उद्देश्य से सर्जन में लगा हुआ था। नाटक रचना, नाट्यकला, नाट्य समीक्षा सभी के प्रति वे एक साथ सतर्क थे । प्रेमधन ने अपनी समीक्षाओं में नये नाट्यशास्त्र की आवश्यकता पर बल देते हुए अंग्रेजी और भारतीय भाषाओं के नाटकों के आधार पर नाट्य-सिद्धान्तों की रचना उचित मानी थी और हमेशा अभिनय तत्व को प्रधानता दी थी। एक पूरे लेखक मंडल, पूरे दल की सक्रियता, सामूहिक स्तर पर नाट्यान्दोलन और रंगान्दोलन की अनिवार्यता का अनुभव जो उस समय था उस रूप में आज भी नहीं है, यद्यपि नाटक बहुत सी सीमाओं को तोड़कर बाहर आया है और हिन्दी रंगमंच जैसी अनुभूति भारतीय रंगमंच के संदर्भ में पैदा हुयी है। इसी युग ने बहुत से अच्छे प्रहसन दिये जो आज भी नाटक-इतिहास में उँगली पर गिने जा सकते है। लेकिन भारतेंदु काल का यह सारा एकनिष्ठ, एकोन्मुख प्रयास नहीं रुक गया उसका क्रम आगे नहीं बढ़ा। जयशंकर 'प्रसाद' जैसे महत्वपूर्ण व्यक्तित्व के आने पर नाटक के साहित्यिक पक्ष और उसकी सोद्देश्यता में तो परिष्कार हुआ लेकिन नाटक अपने माध्यम रंगमंच से सर्वथा कट गया जिसका मुख्य कारण था नाटककारों में पारसी कम्पनी के व्यावसायिक रंगमंच की उपेक्षा। ऐसा नहीं है कि भारतेन्दु व्यावसायिक रंगमंच के दोषों से और नाटक को सस्ते, कुरुचिपूर्ण मनोरंजन तक ले आने की विषम स्थिति से परिचित नहीं थे, उसका उन्होंने बहिष्कार भी किया, विद्रोह विरोध भी किया लेकिन साथ ही वह उस रंगमंच की आवश्यकता के प्रति भी उतने ही सचेत थे उनके बाद 'बेताब' आगा-हब काश्मीरी, हरिकृष्ण जौहर, शैदा आदि ने व्यावसायिक रंगमंच का कलापक्ष ऊँचा करने के लिए उन्हीं के लिए नाटक लिखे, जिससे रंगमंच का कुछ लाभ अवश्य हुआ लेकिन नाटक साहित्य को कुछ महत्वपूर्ण उनसे नहीं मिला । 'प्रसाद' ने अपने सारे नाटक पारसी रंगमंच की घोर प्रतिक्रिया में लिखे जिसकी एक परम्परा बन गयी । यहाँ यह मान लेना होगा कि 'प्रसाद' के अधि कांश नाटकों का रूपबन्ध और रंगविधान एकदम पारसी थियेटर से लिया हुआ है यानी 'प्रसाद' के नाटकों में सारा दृश्यबंध रंगीन पर्दों का है, किसी हद तक अभिनय में भी यांत्रिकता है (ध्रुवस्वामिनी या अन्य नाटकों के बीच-बीच के कुछ स्थल छोड़कर जो उनको व्यक्तिगत विशेषता, मौलिकता है) उसी प्रकार की गीत-योजना, नृत्य, दरबार, समूह गान और चमत्कार की प्रवृति भी है। उन्होंने सारा ध्यान साहित्यिकता, काव्यात्मकता, भारतीय दृष्टि, आदर्श, चरित्र बल, सांस्कृतिक चेतना पर नाटक के बहुमुखी उत्तरदायित्व पर केन्द्रित कर दिया और रंगमंच के दायित्व से अपने को मुक्त कर लिया। इसमें कोई सन्देह नहीं कि प्रसाद ने हिन्दी नाटक को कई मानों में समृद्ध किया, नाटक को काव्य तत्व से जोड़कर उसमें सूक्ष्म सौंदर्य पैदा किया, छायावादी काव्यगीत दिए, इति हास को नयी दृष्टि, संभावनायें दी; उसे वर्तमान जीवन, आधुनिकता बोध से जोड़ा; उसके ढाँचे में अपने पात्रों को स्वतंत्र व्यक्तित्व प्रदान दिया। अपने ऐति हासिक चरित्रों को मानवीय दृष्टि से चित्रित किया लेकिन अपने सर्वथा नये रचना विधान के लिए उन्होंने अनुरूप नयी रंग दशैली की खोज नहीं की। उनका पारसी रंग-विधान उनके काव्यात्मक, साहित्यिक नाटकों के एकदम विपरीत है। एक ओर 'काव्य आत्मा की संकल्पात्मक अनुभूति है दूसरी ओर रूपबन्ध पारसी थियेटर का । ये दोनों इतनी विरोधी प्रवृत्तियाँ है कि 'प्रसाद' का नाटक बिखरा हुआ दिखायी देता है— 'अजातशत्रु', 'चन्द्रगुप्त' और 'स्कन्दगुप्त' में उन इतिहास कालों की समूची परिस्थितियों को उन्होंने कहना चाहा है पूरा ऐतिहासिक वातावरण भी, धार्मिक संघर्ष भी, राजनैतिक परिस्थितियां भी आन्तरिक गृह

कलह, राजनैतिक अराजकता भी, आर्य संस्कृति भी दर्शन भी, स्त्री-पुरुष के सम्बन्धों पर विचार या वाद-विवाद भी परिणामतः कथानक असंगठित लगता है। बहुत से पात्रों की भीड़, अंकविधान छोटे-छोटे बहुत से दृश्य, कुछ चरित्र उभर नहीं पाते, कुछ स्थितियां दब जाती है, पाठ्य तत्व मुख्य हो जाता है और रंग तत्व कम या दोषपूर्ण रूपबन्ध । 'प्रसाद' के विपरीत भारतेन्दु प्रत्यक्ष रंगमंच से जुड़े हैं और स्वतंत्र है। लेकिन 'प्रसाद' के समय से साहित्यिक नाटकों और रंगमंचीय नाटकों के बीच व्यवधान पैदा हो गया। इसका प्रभाव नाट्य समीक्षा पर भी पड़ा। साहित्यिक नाटकों के लिए समीक्षक ने प्राचीन नाट्यशास्त्र के मानदंडों को ही उपयोगी मान लिया । व्यावसायिक रंगमंच के लिए लिखित नाटकों में जो परिवर्तन हो रहे थे, समीक्षक भी नाटककार की तरह उस ओर से एकदम विमुख रहा और उस समय जब कि व्यावसायिक रंगमंच से नाटक कार-समीक्षक कुछ दृष्टि परिवर्तन कर सकते थे। रंगमंच को दे भी सकते थे, एक अलगाव पैदा हो गया। परम्परा चल पड़ी शास्त्रीय परम्परागत वर्गीकरण के आधार पर साहित्यिक नाटकों के मूल्यांकन की । 'प्रसाद के नाटकों का शास्त्रीय अध्ययन' (डॉ० जगन्नाथ शर्मा) समीक्षा पुस्तक से यह परम्परा ऐसी चली कि प्रसाद के नाटकों का भी सही मूल्यांकन लम्बी अवधि तक संभव नहीं हो सका, सारा हिन्दी नाटक भारी बीमारी में जकड़ गया, नाटककार पाठ्य क्रमीय नाटक लिखने लगे, समीक्षक शास्त्रीय सिद्धान्तों के वर्गों-खानों में बांटकर नाटक का शास्त्रीय अध्ययन करने लगे और अन्ततः नाटक कोरी क्लासरूमीय सिद्धान्त चर्चा बन गया यह दुर्गति आज भी ज्यों की त्यों है - कक्षाओं और परीक्षा प्रश्नों में एक प्रचलन हुआ— संवादों की व्याख्या करने का परीक्षाओं में संवाद स्थलों की व्याख्या पूछने का तात्पर्य यह कि भरत मुनि और भारतेन्दु के बाद नाटक के अध्ययन, रंगमच की सीमाओं की जानकारी और उसके आग्रह की धारा लुप्त हो गयी जो आगे चलकर लक्ष्मीनारायण मिश्र, प्रेमी, सेठ आदि में भी नहीं मिलती । इन सभी ने अभिनेता और दर्शक की कल्पना किए बिना कोरे पाठ्य नाटक लिखे । नाटककार तर्कों, विचारों, वाद-विवाद के बौद्धिक जाल में फँस गया क्योंकि हिन्दी का अधिकांश नाट्य साहित्य प्रतिक्रिया में लिखा गया । सब भूल गये कि नाटक कोई कथात्मक वार्तालाप नहीं है, यद्यपि 'प्रसाद' के बाद हिन्दी नाटकों की बड़ी लम्बा सूची है। नाटक और यथार्थ, नाटक और रंगमंच के सम्बन्ध को समझने की कोशिश उपेन्द्रनाथ अश्क में दिखाई दी अगर उन्हें छोड़ दिया जाय तो करीब चालीस वर्ष की भयानक दूरी रंगमंच और नाटक के बीच दिखायी देती है । आज भी रंगमंच, व्यावसायिक या शौकिया संस्थाओं


नाटक और रंगमंच** १९


के प्रति वह दृष्टि नहीं पनपने पायी जो आवश्यक है। पारसी थियेटर से अगर उस समय रंगमंच की आवश्यकताओं को अनुभव किया गया होता, और अन्य बहुत से अव्यावसायिक नाटक दलों को प्रोत्साहन मिला होता तो हिन्दी भाषी क्षेत्र नाटक और रंगमंच क्षेत्र में इतना दरिद्र न रहा होता जब कि बंगाल, महा राष्ट्र, गुजरात में नाटक जीवन का एक अंग बन गया है। हमारे यहां एक स्थायी प्रश्न बन गया कि हिन्दी का रंगमंच क्या है ? कैसा है ? सही रंग चेतना और नाट्य लेखन स्वतंत्रता प्राप्ति के बाद ही सामने आया। एक ओर 'नेशनल स्कूल आफ ड्रामा', संगीत नाटक अकादमी, 'दिशान्तर' जैसी संस्थायें, दूसरी और अल्काजी और मोहन महर्षि जैसे निर्देशकों, मोहन राकेश, लक्ष्मी नारायण लाल, सुरेन्द्र वर्मा जैसे नए नाटककारों ने नाटक की मूल सत्ता की खोज की। अल्काजी ने हिन्दी रंगमंच को भारतीय गौरव दिया, मोहन राकेश ने नाटककार की खुली दृष्टि, सहयोग मनोवृत्ति और 'नाटक को मौलिकता की समझ' का परिचय दिया, ओम शिवपुरी जैसे अभिनेताओं ने अभिनय को कला और मर्यादा दी, लक्ष्मी नारायण लाल स्वयं निर्देशक, अभिनेता प्रस्तुतकर्ता, समीक्षक बनकर रंगमंच की गतिविधियों के साथ रहे। 'आषाढ़ का एक दिन' वह पहला नाटक है जिससे रंगमंच की शक्ति और संभावनाओं को पहचाना एक पूरा दल तैयार किया— रंगकर्मियों का एक पूरा दल | हिन्दी के नये नाटक ने मोहन राकेश से आज तक विभिन्न रंग शैलियों, प्रयोगों को लिया, और यह दृष्टि पैदा की कि एक ही नाटक पर भिन्न-भिन्न प्रयोग संभव है। विभिन्न भाषाओं- फौंच, अंग्रेजी, बंगला, मराठी, गुजरातो, कन्नड, आदि से होने वाले हिन्दी अनुवादों और उनकी प्रस्तुतियों ने भी नाटक के मूल रूप को समझने; उसके विशिष्ट कला रूप को पहचानने में बहुत सक्रिय योग दिया है- हिन्दी के मौलिक नाटककारों में इस समय मोहन राकेश के बाद लक्ष्मी नारायण लाल, सुरेन्द्र वर्मा, मुद्राराक्षस, अमृत राय, ज्ञानदेव अग्निहोत्री गिरिराज किशोर, विपिन कुमार अग्रवाल, शंभूनाथ सिंह, लक्ष्मीकांत वर्मा ने अपने नाटकों और पत्र-पत्रिकाओं में निकलने वाली नाट्य, समीक्षाओं में एक दृष्टि पैदा की है, भयानक शून्य को भरा है और साहित्य, रंगमंच के बीच की खाई को पाटा है – 'नटरंग' पत्रिका इस अर्थ में सदैव स्मरणीय रहेगी । नेमिचंद्र जैन की सम्पादकीय टिप्पणियों और आमंत्रित परिचर्चाओं में और इधर की कुछ नयी समीक्षा पुस्तकों में यह तथ्य बार-बार सामने आया है कि शास्त्र, पूर्वाग्रहों या तात्कालिक रुचियों के 'फेम' में नाटक को बैठाना गलत है। हर नाटक के पीछे नाटककार की अपनी रंग-कल्पना होती है, उसे खोजना-समझना समीक्षक का दायित्व है। इससे भी अधिक महत्वपूर्ण है

नाटक की मूल प्रेरणा को अनुभव करना क्योंकि वही उसके रूप-बन्ध और रंग बोध को बनाती है। नाटक पर विचार करते समय जितना जरूरी उसकी कथा वस्तु, पात्र और भाषा पर सोचना है, उतना ही आवश्यक उसके रचना-नियमों; उसकी प्रदर्शन क्षमताओं, उसकी सारी रचना-पद्धति को प्रभावित करने वाली रंगमंच की रूढ़ियों, प्रदर्शन के साधनों और शैलियों पर विचार करना है तभी नाटक की निजी सत्ता और उसकी जटिलता का अनुभव हो सकता है। जिस तरह भावपक्ष और कलापक्ष के खानों में बाँटकर न्याय नहीं किया जा सकता उसी तरह छः तत्त्वों अर्थ प्रकृतियों, संधियों आदि शास्त्रीय वर्गों में बांटकर उसके रंगमंच पक्ष को एकदम भुलाकर नाटक को पढ़ना-पढ़ाना, समझना एक सशक्त विधा की हत्या करने जैसा है। रंगमंच नाटक अध्ययन का कोई एक नहीं है जिसे अलग करके देखा जाय; समूचा नाटक उस संदर्भ में देखना होगा। इसीलिए, कथानक, पात्र, भाषा को समझने की दृष्टि में ही परिवर्तन करना होगा ।


यह सही है कि अभी कविता या कहानी-समीक्षा की तरह नाट्य समीक्षा उतनी विकसित नहीं हुयी है लेकिन फिर भी पिछले १५-२० वर्षों में लेखन, प्रदर्शन, रंग- समीक्षा, दर्शक के सौन्दर्यबोध में जो मोड़ आया है उस आधार पर सोचना आवश्यक होगा कि नाटक के नये प्रतिमान क्या होंगे ? अगर हम नाटक को 'रचना और पुनर्रचना' मानते हैं तो यह समझना मुश्किल नहीं है कि नाटक में जितने आवश्यक तत्त्व कथानक, पात्र और संवाद हैं उतने ही आवश्यक निर्दे शक, दर्शक, अभिनेता और रंगशिल्प हैं। कथानक नाटक का मूलाधार है इसमें कोई सन्देह नहीं । भरत मुनि और अरस्तू ने उसके महत्व को स्वीकार किया है क्योंकि कथानक के बिना नाटक का कोई ढाँचा खड़ा हो नहीं सकता। यह नाटक कार की रुचि और दृष्टि पर निर्भर करता है कि वह कथानक कहाँ से चुनता है - इतिहास से, पुराण से या सीधे यथार्थ से, नित्य प्रति की अनुभूतियों से । लेकिन इतना निश्चित है कि उपन्यास, कहानी के कथानक से नाटक के कथानक का रूप एकदम भिन्न होता है। कथानक उसमें आवश्यक होते हुए भी प्रधान नहीं होता – अनेक घटनाओं का संकलन नाटकीय कथानक नहीं है, औपन्यासिक कथानक भले ही हो क्योंकि नाटकीय कथानक पात्रों द्वारा बुना जाता है और पात्रों से उसे दर्शक मन में घटित होना होता है । इसलिए नाटकीय कथानक के बारे में अब यही देखने की जरूरत नहीं है कि वह कितने अंकों, दृश्यों; अर्थ प्रकृतियों, सन्धियों में बँटा हुआ है या उसमें आरम्भ, विकास, अन्त किस रूप में हुआ है। इससे कहीं ज्यादा जरूरी है यह देखना कि कथानक एक संगठित रूप में अपना प्रभाव छोड़ पाता है या नहीं ? कि कथानक और पात्र एक दूसरे की अभिव्यक्ति कर रहे हैं या नहीं ? ऐसा तो नहीं है कि कथानक का फ्रेम तैयार है और पात्रों को उसमें फिट करने का सायास प्रयत्न किया जा रहा है। स्थितियां दोनों हो सकती हैं एक यह कि कथानक बड़ा रोचक, प्रभावपूर्ण है लेकिन पात्र कठपुतली की तरह निर्जीव लग रहे हैं, दूसरा यह कि कथानक ही बड़ा बनावटी, बेजान है लेकिन पात्र व्यक्तित्व की सजीवता लिए हुए। दोनों कमियाँ होने पर यानी कथानक और पात्रों में परस्पर सामंजस्य न होने पर कथानक बिखरता जाता है। पात्र घिसटते हुए लगते हैं। इसलिए यहाँ कथानक के विषय से ज्यादा महत्त्वपूर्ण है नाटकीय कथानक या घटना-विन्यास के वैशिष्ट्य को समझना । बहुत से नाटकों में देखा जा सकता है कि नाटककार को कथानक में इतना कुछ कहने का मोह हो जाता है कि वह बहुत से क्षेत्रों से बहुत सी घटनाएँ बटोर लेता है, अनेक दृश्य चुन लेता है और पात्रों की पूरी भीड़ लगा देता है। बहुत सी समस्याओं को उठाने के मोह में पात्र निरन्तर बोलते कथन करते ही ज्यादा लगते हैं। यही नहीं मुख्य और आवश्यक पात्रों के अति रिक्त अन्य बहुत से निरर्थक निर्जीव चरित्र आते हैं- चले जाते हैं - परिचय और परिचय की समाप्ति की तरह। 'प्रसाद' के अधिकांश नाटकों में- 'चंद्रगुप्त' 'अजातशत्रु' में यह विषम स्थिति बराबर मिलती है जो नाटक की निजी माँग को न पहचानने के कारण है ।


आधुनिक नाटकों को देखने पर एक बात और सामने आती है कि कथानक विशेष का होना न होना कोई अहम सवाल नहीं है। भुवनेश्वर के 'ऊसर' और 'ताँबे के कीड़े' कथाविहीन नाटक हैं लेकिन पात्र सारी स्थिति के सत्य के प्रेषक हैं। नाटक में कथा का कौतूहल नहीं दृश्यत्व की जिज्ञासा होनी चाहिए। आज के बहुत से नाटक 'बादशाह बेगम गुलाम' (गिरिराज किशोर) 'शायद ही' (शोभना भूटानी) 'शायद', 'है' (मोहन राकेश) आदि का सौन्दर्य कथानक विशेष के होने में नहीं है-- पात्रों की बातचीत, क्रियाओं में है जो नाटक को बनाते हैं । इसलिए ज्यादा महत्वपूर्ण हैं पात्र और संवाद। पात्रों के सम्बन्ध में भी आज यह दृष्टि एकदम निरर्थक है कि हम उन्हें शास्त्रीय दृष्टि से धीरोदात्त, घीरललित, धीरोद्धत आदि के खानों में बाँटकर उनकी उपयुक्तता अनुपयुक्तता निर्धारित करें। नाटकीय पात्र हम जैसे मानव ही हैं उससे अलग या विशिष्ट नहीं पात्र ऐति हासिक भी हो सकते हैं, पौराणिक भी, प्रतीक पात्र भी। लेकिन आज की कोई भी कृति खास तौर से नाटक जो आज के यथार्थ से, बौद्धिक प्रश्नों से और मनुष्य के सामने फैले संकट से नहीं जूझती, बेकार है। इसीलिए आवश्यक है।

किसी भी ऐतिहासिक या पौराणिक चरित्र को उसके मूल अर्थ के साथ-साथ एक नये संदर्भ में रखना और उसके द्वारा आज की विडम्बना को उद्घाटित करना जैसे 'आप का एक दिन 'मि० अभिमन्यु' में आज की व्यवस्था पद्- मंत्र के चक्रव्यूह में फंसे राजन् की त्रासदी या 'पहला राजा' के वे प्रतीक पात्र जो दुहरी अर्थव्यंजना देकर मानवीय यथार्थ का प्रामाणिक उद्घाटन करते हैं। पात्र के साथ अभिनेता जुड़ा हुआ है अत: पात्र कथानक का अंग होते। भी व्यक्तित्व से सम्पन्न होगा जिसमें उसका अन्तर्जगत ही ज्यादा महत्व रखता है उसके कार्य कलाप नहीं। इसलिए पात्रों के व्यक्तित्व की अभिव्यक्ति उन संवादों में होती है जो नाटक के सबसे अनिवार्य तत्व कहे जायेंगे। कथानक को गढ़ने और बुनने में, उसके उलझाने-फैलाने में संवाद ही मुख्य होते हैं। संवादों से ही सभी पात्रों व्यक्तिगत विशेषताओं का, उनकी उलझनों, द्वन्द्वों, मानसिक जटि लताओं का, विचारों और सोचने के ढंग का पूरा परिचय मिलता है। यही कारण है कि मल्लिका के संवादों में भावुकता, तन्मयता है, सावित्री के संवादों में तीखापन तेजी । हर पात्र के संवादों की गति, लय, उतार-चढ़ाव, टोन में, बनावट में अन्तर होगा। यद्यपि मूक नाटक भी कथानक और चरित्र को प्रका शित करते हैं लेकिन वह एक 'सीमित' रूप है, उसे अगर छोड़ दें तो संवाद नाटक का अनिवार्य अंग है। मैं संवादों को इस अर्थ में ही नहीं लेता कि संवाद ही मन में होने वाले नाटक को एक वाह्य रूप दृश्यरूप प्रदान करते हैं-- करते हैं सही है लेकिन नाटककार अपनी आवश्यकता और चिन्तन के आधार पर उन्हें लाता है, नहीं भी लाता, कभी-कभी किसी नाटक के बीच में ऐसे शून्य मौन पल भी आ जाते हैं जो संवाद से अधिक मूल्यवान हो जाते हैं और वही गहरा प्रभाव छोड़ते हैं लेकिन यह नहीं भूलना चाहिए कि वह प्रभावशीलता या सौंदर्य संवादों के बीच में आने वाले मौन से ही आता है संवाद न हो तो वह 'शून्य', 'क्रिया' नहीं बन सकता । संवाद-रचना में ही नाटककार को गहरे अनुशासन से काम लेना पड़ता है। पहले जब नाटक में कथा उत्व प्रधान होता था और नाटककार को भारतीय आदर्श जीवन-दर्शन, दार्शनिक विचार प्रस्तुत करते रहते थे तब संवाद ज्यादातर पात्रों के 'कथन' मात्र, वाद-विवाद, तर्क-वितर्क के रूप में आते जाते थे लेकिन अब जब घटना जाल कम और द्वन्द्वात्मकता, मानसिक गुत्थियाँ या चारों तरफ व्याप्त व्यक्ति का दोहरापन मुख्य हो गया है; संवाद-रचना भी एक कठिन काम हो गया है। यहीं नाटककार स्वयं एक चिन्तक समीक्षक बन जाता है और यहीं गहरे अनुभव की आवश्यकता होती है। संवाद की सारी सुन्दरता पात्र के व्यक्तित्व को प्रकाशित करने में और उससे भी अधिक भाव भंगिमाओं, अभिनय, गीत, अंग-संचालन सभी की संभावना लिये होने में है। संवादों के संक्षिप्त होने या लम्बे होने से उतना अन्तर नहीं पड़ता जितना कि उसके पीछे व्यापक नाट्यानुभूति होने से । मोहन राकेश ने अपने नाटकों की संवाद-रचना से यह सिद्ध कर दिया है ।


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