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नाटक कलारी (klari)

 'कलारी  नाटक' जैसा कि आप सभी नाम से ही परिचित होंगे कि  साधारणतः उत्तर प्रदेश के अनेकों  जिलों में  'ठेका देसी शराब' को  आंचलिक भाषा, बोली में 'कलारी' कहा जाता है । नशा मुक्ति अभियान पर आधारीत 'कलारी नाटक' के मंचन में  अत्यधिक शराब पीने से  घरों में  रोजाना घटने वाली घटनाओं/ ग्रह क्लेशों से है । पात्र 'शमशेर' किस तरह से नशे में  पत्नी 'बिंदिया' से मारपीट कर उससे शराब के लिए पैसे मांगता है , यहीं नहीं नशे की लत में गरीब मजदूर वर्ग किस तरह से खुद को मौत की गर्त में ढकेलता चला जाता है यह दर्शाया गया है, साथ ही अपने दोस्त 'बिरजू' और 'कलुआ' की गलत संगत में पढ़ कर घर परिवार की पूंजी/ वस्तुओं को जुआ, शराब में बर्बाद कर देता है । नाटक  का  अंतिम  दृश्य  ह्रदय विदारक है  जिसमें  जहरीली शराब पीने की बजह से पात्र 'शमशेर'की  तड़प - तड़प कर मौत हो जाती है । उपरोक्त नाटक  के मंचन में  कुशल अभिनय  कौशल रखने वाले  बालीबुड फ़िल्म कलाकर  नक्श  थियेटर के  डायरेक्टर 'अमित सक्सेना' के नेतृव म...

नाटक और रंगमंच भाग एक

नाटक  और रंगमंच हिन्दी नाटक और नाटककार की दृष्टि, लेखन और नाटकीय समझ में बहुत महत्त्वपूर्ण और अनिवार्य मोड़ आया है। अक्सर सहयोग, सहअस्तित्व, सामंजस्य, 'नाटक और विचार', 'नाटककार और रंगमंच', नाटक कार और निर्देशक', 'नाटककार के अधिकार' के सवाल टिप्पणियों में, लेखों में उठते रहे हैं जिनसे हिन्दी नाटक जगत में सक्रिय आन्दोलन का परिचय तो मिलता ही है, एक लम्बे शुन्य और जड़ स्थिति के बाद सारे भ्रमों को तोड़कर नाटक की मौलिकता भी प्रतिष्ठित होती है। आज से कुछ वर्ष पहले मोहन राकेश ब० व० 'कारन्त और अनेक व्यक्तियों ने नाटक में सहयोग, सहअस्तित्व और सामं जस्य की बात कही थी और साहित्यिक विधा के रूप में उसके सही और पूर्ण रूप को समझने-समझाने का प्रयत्न किया था। इधर पन्द्रह वर्षों से नाटककार ने स्वयं नाटक को पहचाना ही नहीं है, बल्कि नाट्य समीक्षा के प्रतिमान बदलने की भरपूर कोशिश की है। प्रायः कहा जाता है और सही भी है कि हिन्दी नाटक अभी बहुत पिछड़ा हुआ है। यह सचमुच आश्चर्य की बात है कि सबसे पुरानी विधा होते हुए भी जीवन और विचार से, नवीनता और प्रयोग से, अनेक सम स्याओं से उसका ...
 (दिलीप  कश्यप )फर्रुखाबाद-  शास्त्रीय संगीत में विश्व पटल पर  फर्रुखाबाद  घराने को पहचान दिलाने वाले तबला वादक उस्ताद हाजी विलायत देश के छह प्रसिद्ध तबला घरानों में से एक है फर्रुखाबाद घराने की मिठास के लोग दीवाने है  यहां जन्मे तबला वादक उस्ताद हाजी विलायत अली ने तबला वादन में फर्रुखाबाद के  घराने के नाम से पहचान  दिलाई तो वहीं  ठुमरी के सम्राट पण्डित ललन पिया  ने अपनी ठुमरी में शब्दों के मोती पिरोकर  संगीत के क्षेत्र में ठुमरी  की से पहचान दिलाई  संगीत के इन ठुमरी पाण्डित्य और उस्ताद को अब लोग भुलाते जा रहे  हैं । दुर्भाग्य बस कहना पड़ रहा है कि शायद  जिन  महान व्यक्तित्व  से पूरे फर्रुखाबाद के संगीत  मण्डली को  गर्व होता है  उन्ही के शहर में आज वह अनजाने बेगाने नजर आ रहे है यही नहीं  जिस प्रकार से युवा पीढ़ी  इन उनके इतिहास योगदान से  अपरिचित और विमुख यह  एक असहनीय पीड़ा के समान है । आने वाले समय में इनकी विरासत को  संजोने वाले तक नहीं दिख रहे । वही आरोप है ...

चाँद' का वात्सल्य रूप

 'चाँद' का वात्सल्य रूप  ***************** 'वैशाखी-पूर्णिमा, के दिन शाम को रोज की तरह  सैर के लिये निकला तो 'आसमान' में  'प्रकृति' अपनी छटा बिखेर रही थी! इतना अलौकिक और मनोरम दृश्य मैंने पहले कभी न देखा था ।बड़े -बड़े 'भवनों',-ऊंची 'इमारतों' को फाँद कर 'चाँद' मेरे सामने खड़ा हो जाता! बाजार से घर तक आने में महज आधे घण्टे का समय लगा 'चाँद' को देख लगातर मेरी नजरें आसमान में ही गढ़ी रहीं ।'चाँद' -'मुझे और मैं उसे टकटकी लगाए देखे जा रहा था। झुकझुका होने की बजह से 'सूर्य' अपने 'घर को जा  चुका था, उसकी लालिमा से 'आसमान' भगवामयी दिखाई पड़ रहा था।ऐसा लग रहा था जैसे 'गगन' में श्वेत' रंग के गुब्बारे में 'प्रकृति' ने प्रकाश भर दिया हो! 'आसमान' में काले, सफेद बादलों की हल्की परतें छाई हुई थी,वह बरसने अथवा गरजने का आभास प्रदर्शित नहीं कर रहे थे,पक्षी ची -ची करते हुए अपनी माओ के साथ,शयन के लिये घोसलों में प्रस्थान कर रहे थे।हल्की-हल्की हवा' से 'नीम', 'पीपल' के बड़े- बड़...

लंगड़ा,गूंगा,अंधा,बहरा मौन खड़ा हूँ मैं.......

 लंगड़ा,गूंगा,अंधा,बहरा मौन खड़ा हूँ मैं.......  सरकारी ताने  बाने से  हड़ा पका हूँ मैं...  क्यों ज़िद  करता हूँ...  सरकारी दरबारों में... हुई है आँखे पथरीली मेरी  पढ़-पढ़ ये अखबारों में... आज मिलेगा कल मिलेगा  लाभ तुम्हे इस जीवन में...  चीख उठी है आत्मा मेरी  अरमानों की शय्या पर...  नहीं-नहीं विश्वास रहा है.. नेता जी वाले भईया पर...

कैसा ये इंसान हुआ ,भूल गया है रब,

 अन्तरराष्ट्रीय महिला दिवस पर । कैसा ये  इंसान  हुआ ,भूल गया है रब, हुई है रद्दी फरियादे,धूल फांकती सब । डर लगता है जीने में,सहती रही हूँ सब, मन मे बस यह पीड़ा,न्याय मिलेगा कब । भूख हवस की है बड़ी,कृत्य किया है जान। शर्मिन्दा इंसानियत ,कैसा ये इंसान।। अस्मत बिटिया की लुटे,चुप क्यों है परधान। नारी पीड़ा कह रही,पहनों मेरा परिधान।। राज भवन से हो रही,अब ऐसी कुछ माँग रेप देश मे जो करे,उसको सूली टांग ।। अज्ञानी पौरुष बना,करता निशिदिन पाप। लज्जा बिटिया की लूटी,रहा बिलखता बाप।। दुष्कर्मी ने इस तरह ,कर डाला संघार । पहले लूटा लाज को,किया बाद में वार ।। कैसे ये इंसान हैं,बेंचे जो ईमान । इस अनीति व्यापार में,शामिल है शैतान।। पैरों में बेड़ी पड़ी निकल रही है जान। दुख अपना किससे कहे,होती नारी महान ।। रचनाकार  दिलीप कश्यप "कलमकार"  फर्रुखाबाद उत्तर प्रदेश ।9026692199

फर्रुखाबाद की बसन्त पँचमी पर विशेष --

 बचपन में "बसन्त पंचमी" को लेकर खास उत्साह रहता था, करीब एक महीने पहले से ही हम लोग बसन्त" की तैयारी में जुट  जाया करते थे।  कितने खूबसूरत हुआ करते थे वे दिन,"बसन्त पंचमी" का पर्व फर्रुखाबाद वासियों के लिये विशेष होता है,वो इसलिये क्योंकि यहाँ "पतंगबाजी" के   शौक से गहरा सम्बन्ध है।  'हालांकि यह स्पष्ट नहीं है कि  "पतंगबाजी" की शुरूआत यहाँ बसन्त पंचमी पर कैसे हुई? लेकिन  बचपन से लेकर अभी तक देखा है इस पर्व को उमंग और उत्साह के साथ "पतंग उत्सव" के रूप में ही मनाया जाता है।  जैसे "होली" रंगों के लिये, "दिवाली" पटाखों के लिये,"रक्षा बंधन"  राखी के लिये, ठीक इसी तरह  "पतंग" के लिये "बसन्त" विशेष पर्व के रूप में  मनाया जाता है । उन स्वर्णिम दिनों की बात करूँ तो आज भी याद  हैं कि एक -एक "पतंग" के लिये कितना लड़ते- झगड़ते, कूदते -फांदते  गाली देते गालियाँ  खाते, कभी पिता जी की फ़टकार तो कभी  माँ का प्यार, पतंगबाजी" करने में इतना लीन की खाने - पीना से चिंतामुक्त , प्रातः काल...