कैसा ये इंसान हुआ ,भूल गया है रब,

 अन्तरराष्ट्रीय महिला दिवस पर ।

कैसा ये  इंसान  हुआ ,भूल गया है रब,

हुई है रद्दी फरियादे,धूल फांकती सब ।

डर लगता है जीने में,सहती रही हूँ सब,

मन मे बस यह पीड़ा,न्याय मिलेगा कब ।


भूख हवस की है बड़ी,कृत्य किया है जान।

शर्मिन्दा इंसानियत ,कैसा ये इंसान।।

अस्मत बिटिया की लुटे,चुप क्यों है परधान।

नारी पीड़ा कह रही,पहनों मेरा परिधान।।

राज भवन से हो रही,अब ऐसी कुछ माँग

रेप देश मे जो करे,उसको सूली टांग ।।

अज्ञानी पौरुष बना,करता निशिदिन पाप।

लज्जा बिटिया की लूटी,रहा बिलखता बाप।।

दुष्कर्मी ने इस तरह ,कर डाला संघार ।

पहले लूटा लाज को,किया बाद में वार ।।

कैसे ये इंसान हैं,बेंचे जो ईमान ।

इस अनीति व्यापार में,शामिल है शैतान।।

पैरों में बेड़ी पड़ी निकल रही है जान।

दुख अपना किससे कहे,होती नारी महान ।।

रचनाकार 

दिलीप कश्यप "कलमकार" 

फर्रुखाबाद उत्तर प्रदेश ।9026692199


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