चाँद' का वात्सल्य रूप
'चाँद' का वात्सल्य रूप
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'वैशाखी-पूर्णिमा, के दिन शाम को रोज की तरह सैर के लिये निकला तो 'आसमान' में 'प्रकृति' अपनी छटा बिखेर रही थी! इतना अलौकिक और मनोरम दृश्य मैंने पहले कभी न देखा था ।बड़े -बड़े 'भवनों',-ऊंची 'इमारतों' को फाँद कर 'चाँद' मेरे सामने खड़ा हो जाता! बाजार से घर तक आने में महज आधे घण्टे का समय लगा 'चाँद' को देख लगातर मेरी नजरें आसमान में ही गढ़ी रहीं ।'चाँद' -'मुझे और मैं उसे टकटकी लगाए देखे जा रहा था। झुकझुका होने की बजह से 'सूर्य' अपने 'घर को जा चुका था, उसकी लालिमा से 'आसमान' भगवामयी दिखाई पड़ रहा था।ऐसा लग रहा था जैसे 'गगन' में श्वेत' रंग के गुब्बारे में 'प्रकृति' ने प्रकाश भर दिया हो! 'आसमान' में काले, सफेद बादलों की हल्की परतें छाई हुई थी,वह बरसने अथवा गरजने का आभास प्रदर्शित नहीं कर रहे थे,पक्षी ची -ची करते हुए अपनी माओ के साथ,शयन के लिये घोसलों में प्रस्थान कर रहे थे।हल्की-हल्की हवा' से 'नीम', 'पीपल' के बड़े- बड़े वृक्षों के पत्ते हौले -हौले हिलोरें भर रहे थे।धीरे -धीरे 'चाँद' अपने शबाब पर आता जा रहा था! 'आसमान में वह अपने होने का भान करा रहा था। ऐसा लग रहा था,जैसे हम दोनों काफी लम्बे अंतराल से आपस वार्तालाप कर रहे हो!
ऐसा लम्हा मैंने पहली बार महसूस किया, बार- बार पवन का झोखा मेरे कानों में मानो कुछ कह के चला जाता हो!
उधर 'सूरज' की लालिमा पूरे आभा मण्डल को से 'लाल, पीले',नीले' 'अम्बर' में सफेद काले बादलों में 'इंद्रधनुषी' रंग भर रही थी! मेरा मन छत पर रहकर 'चाँद' के प्रति सारी जिज्ञासाओं को शान्त करने का कर था उससे मन को आकर्षित करने वाली किरणें प्रवाहित हो रहीं थी,किसी बादल की हिम्मत न थी जो उसके 'प्राकृतिक' सौंदर्य को ढक सके!'बुद्ध- पूर्णिमा' की रात में 'तमस' प्रभावहीन प्रतीत हो होता रहा,' आसमान' में घने 'तारे' भद्दे-भद्दे टिमटिमाते नजर आ रहे थे,कुछ बादलो को चकमा देकर अपने होने का अहसास दिलाते!
'चाँद' के कुछ ही दूरी पर एक 'तारा' अलग से चमक रहा था उसका 'विलक्षणि' प्रकाश अद्भुत था,'ध्रुवतारा' और 'चाँद' आज दोनों एक दूसरे के प्रतिद्वन्दी मालूम पड़ रहे थे! हर रोज अपना आकर बदलने वाला 'चाँद'एक वृत्त के समान नजर आ रहा था, वह न तो छोटा था, न ही बड़ा ! 'शून्य की तरह, 'श्वेत रंग में अपनी शीतलता प्रकट कर 'वात्सल्यता' का परिचायक बना रहा।
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